The Saltlist

Satire in the Age of Letters and Technology- more than just a pinch of it.

गड्डी नई, लोग वहीं

  Namita Singh
राष्ट्रीय मंडल खेलों के दौरान दिल्ली को नई -नई  लाल और हरी ‘लो – फ्लोर’  बसो से रूबरू कराया गया |  नए वाहनों के आने पर दिल्ली को दुल्हन के समान सुन्दर बतलाया जाने लगा | इन बसों को चलता देख कर जहाँ शंघाई की याद आई वहीँ  इन बसों में चढ़े लोगों को चल बसा देखकर परलोक की|
एक के बाद एक बस हादसों ने ‘ब्लू लाईन’  बसों की डामाडोल हालत का स्मरण करा दिया | उस समय का विस्तार से विवरण करें तो खड़कती बसें और मटकती कमर एक समान लगने लगी   थी  ! मन में प्रश्न  उठता था  कि इस सुंदर नृत्य  प्रदर्शन का श्रेय किसको दे ? बसों  में बढती आबादी के ज़ोर को या सडकों में गड्ढों की होड़  को |
मंडल खेलों के साथ समय बदला ,सड़कें बदली, वाहन बदले परन्तु चालक नहीं | फिर क्या था ? लोग बस में जाते और उनकी खबर ही घर आती | लाल -लाल लो फ्लोर बसें  युम्दूत का स्मरण कराने लगी | जब तक अधिकारियों  के सुन्दर नयन नींद से खुले  तब तक लोगों का विश्वास  इन बसों से उठ चुका था | शायद नई दुल्हन नई नहीं रही , पुरानी  हो गयी थी और अंदाज़ कातिलाना |

मेट्रो के आने के बाद  बसों में आबादी घटी तो  किराया  बढ़ गया  और साथ ही अन्य मसले भी | औरत के लिए आरक्षित जगह पर पुरुष बैठ जाते और कुछ कहने पर गरम लोहे के समान जगमगाते | रोज़ किसी बात पर हुड़दंग होता , कभी कहीं दबंग तो कहीं लोक सभा का मंच होता | रात्री के समय बसों  में छेरखानी ,  चोरी और अभद्र भाषा   का प्रयोग आम बात नज़र आती है परन्तु इस बढते दु:व्यवहार का कारण ,सरकार स्त्रियों के वस्त्र- आभूषण  को ही बतलाती है |
टिकेट न लेना , किराया न देना , मिलती सेवाओं पर पान थूक देना  | शायद आदत मजबूरी और मजबूरी कमज़ोरी बन चुकी है | तभी तो भारत में एशिया के अधिकतम लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं | बीते वर्ष दो हज़ार से अधिक इन हादसों में मारे गए और ज़्यादातर शराब पीकर गाडी चलाने के कारण दुर्घटना का शिकार हुए | हर नाकामी का बोझ सरकार के माथे पर मढ़ देना ,सार्वजानिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझ उठा लेना , नई सेवाओं पर मुत्रविसर्जन कर देना , हर जुलूस और हरताल में आक्रामक हो  बसों के शीशे  फोड़ना | ऐसा प्रतीत होता है कि बदलाव की आग ने बुद्धि  को ही भस्म कर दिया है |
नई  सड़कें , सडकों में पड़े गड्ढे  और गड्ढों  में पड़े हम – नए भारत की कुछ हद तक बदलती सच्चाई यहीं बन कर रह गयी है | अंत में समापन करते हुए बस यहीं पूछना चाहूंगी कि क्या यहीं उभरता भारत है ?  क्या यहीं बदलता भारत है ?  बस  शायद एक जाये तो दूसरी आ जाएगी परन्तु उसके साथ बीतने वाला समय , इज्ज़त, सम्मान और  छवि न आ पाए |
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12 comments on “गड्डी नई, लोग वहीं

  1. delhi roxx
    January 23, 2012

    dtc ka toh samooohik balatakaar ho gya

    • namita
      January 23, 2012

      hahaa! i ll take this as a compliment ! thank you ma’am .

  2. Lata Jha
    January 24, 2012

    Fantabulous!

    • namita
      January 24, 2012

      thank you ! lata !

  3. Hemul Goel
    January 24, 2012

    good job!

    • namita
      January 28, 2012

      thank you hemul 🙂

  4. delhi roxx
    January 26, 2012

    haaye raam!!! wt do v call hindi dictionary…….aaahhh yes shabdkosh phek phek kr maara h boss!!!!!!
    grt wrk!!1

    • namita
      January 27, 2012

      hey ! thanks a lot !

  5. Dilip Dwivedi
    January 28, 2012

    I do not know why people are not conscientious enough, I do not know where there was a gap in bringing up our society, and people. What our elders did they did, and cannot be blamed, every human after a certain age is being responsible for his or her actions. If I read Bipan Chandra’s India Since Independence I see a different upbringing of Indian Society, and Arun Shourie Gives a different version. The most disheartening thing is that we don’t even have that zeal to fill the gaps of the history. My feeling is things are going haywire because right from the starting we set the wrong priorities in life, that is my observation, and it becomes too late when we finally realize this or never realize.

    • namita
      January 28, 2012

      @dilip ! very well said !
      it is not just that we set wrong priorities but even more . lack of self check , realization and impulsive reactions that cause more damage to our society.

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This entry was posted on January 23, 2012 by in The Saltlist in Hindi and tagged , , .

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