The Saltlist

Satire in the Age of Letters and Technology- more than just a pinch of it.

ये कैसी राजनीति?

By: Namita Singh

संसद एवं विधान सभा में हमने अपने सांसदों और राजनेताओं को एक-दूसरे पर चप्पल-जूते फेंकते, अभद्र भाषा का प्रयोग करते, गरम- गरम नोटों की हरी-हरी पत्तियाँ लहराते और न जाने कितने कांड करते देखा है। कभी कभी यह सास-बहू की नोकझोक से ज़्यादा मनोरंजक लगती है तो कभी हास्यप्रद कार्यक्रमों से अधिक हास्यातमक।
एक ओर जहाँ २-जी घोटाला कांग्रेस के गले की फांस बना बैठा है, वहीं दूसरी ओर ३-जी मोबाइल फोन के साथ भाजपा भी कांग्रेसियों को टक्कर देती नज़र आ रही है। कौन कहता है कि हम अमरीका से कुछ सीख नही सकते? पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के पदचिह्नों पर चलते हुए भारतीय सांसद भले ही उनके द्वारा स्थापित मापदंड को ना भेद पाए हों परंतु वह उनसे ज़्यादा पीछे खड़े नज़र नही आते। भाजपा के दो सांसद, श्रीमान सी सी पाटिल और श्रीमान लक्ष्मण सावदी जी दूसरे सहकर्मी, कृष्णा पालेमर के फ़ोन से विधान सभा परिषद में अश्लील चलचित्र देखते हुए पकड़े गए।
इस खबर के फैलते ही, बिना कोई समाय गंवाए, तीनो मंत्रियों का इस्तीफ़ा स्वीकार किया गया और साथ ही स्पीकर साहब ने जाँच के आदेश दे दिए।

एक ओर जहाँ भाजपा ने हादसे से पार्टी का पल्ला झाड़ते हुए, इसे दुखद बतलाया, वहीं दूसरी ओर मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल मसले पर चुटकियाँ लेते नज़र आए। अटकलों के अनुसार, उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता था और इसी से बचने के लिए भाजपा ने तीनो मंत्रियों का पत्ता साफ़ कर दिया।
इस किस्से ने, न सिर्फ़ भारतीय नेताओं की दोहरी सोच को उजागर किया है, परंतु साथ ही सभा की गरिमा को क्षति पहुँचाई है। यह बात तब और भी हिलने वाली लगती है, जब ऐसे आरोप उन नेताओं पर लगते हैं जो स्त्री एवं बाल विकास मंत्री होते हुए औरतों के वस्त्र आभूषणों को उनके बलात्कार का कारण बतलाते हैं और ऐसी पार्टी के प्रतिनिधि हैं, जो स्वयं को भारतीय संस्कारों और मूल्यों का रक्षक घोषित करती आई है।
इस खबर ने जहाँ ब्रेकिंग न्यूज़ का दर्जा हासिल कर खूब सुर्खियाँ बटोरी, वहीं पत्रकारों और समाचार केंद्रों के नैतिक मूल्यों पर सवाल खड़े कर दिए। इस खबर को प्रसारित करते हुए जहाँ कुछ न्यूज़ चैनलों ने इस फ़िल्म को इंटरनेट द्वारा हासिल करने के तरीके बता दिए वहीं दूसरी ओर अन्य समाचार केंद्रों ने दर्शकों की जिज्ञासा को शांत करने के लिए स्वयं ही उस चलचित्र का प्रसारण कर सारी हदें पार कर दी।
इस हादसे को भारतीय संस्कृति बनाम पश्चिमी संस्कृति में समेट कर रख देना बेईमानी होगी। समझने की ज़रूरत है की कोई भी समाज अश्लीलता का प्रचार नहीं करता। नज़रिया बदल कर देखें तो एक दृष्टिकोण यह भी है कि इस हादसे ने न सिर्फ़ हमारे राजनेताओं की दोहरी प्रवृत्ति को उजागर किया है परंतु हमारी समझ में पल रही राष्ट्रवादी सोच को भी राष्ट्र के समक्ष ला कर खड़ा कर दिया है। सभा की गरिमा को तब भी उतनी ही क्षति पहुँचती है जब कोई सांसद अपने कर्म से भटक कर अन्य ग़लत काम करता है। सभा परिषद में सोना भी उतना ही दंडनीय अपराध है जितना अश्लील चलचित्र देखना।
अंत में समापन करते हुए यहीं लिखना चाहूँगी कि अश्लीलता का ना राजनैतिकरण होना चाहिए और ना सामाजीकरण।

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This entry was posted on February 20, 2012 by in National, The Saltlist in Hindi and tagged , , .

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